Wednesday, April 27, 2011

भविष्य की सभ्यता स्त्री के आसपास बनेगी




बुनियादी भूल जो सारी शिक्षा और सारी सभ्यता को खाए जा रही है, वह यह है कि अब तक के जीवन का सारा निर्माण पुरुष के आसपास हुआ है, स्त्री के आसपास नहीं। अब तक की सारी सभ्यता, सारी संस्कृति, सारी शिक्षा पुरुष ने निर्मित की है, पुरुष के ढंग से निर्मित हुई है, स्त्री के ढंग से नहीं।

पुरुष के जो गुण हैं, सभ्यता ने उनको ही सब कुछ मान रखा है। स्त्री की जो संभावना है, स्त्री के जो मन के भीतर छिपे हुए बीज हैं, वे जैसे विकसित हो सकते हैं, उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया है। पुरुष बिलकुल अधूरा है, स्त्री के बिना तो बहुत अधूरा है। और पुरुष अगर अकेला ही सभ्यता को निर्मित करेगा तो वह सभ्यता भी अधूरी होगी; न केवल अधूरी होगी, बल्कि खतरनाक भी होगी।

वह खतरनाक इसलिए होगी कि पुरुष के मन की जो तीव्र आकांक्षा है वह एंबीशन है, महत्वाकांक्षा है। पुरुष के मन में प्रेम बहुत गहराई पर नहीं है, महत्वाकांक्षा! और जहां महत्वाकांक्षा है वहां ईर्ष्या होगी, जहां महत्वाकांक्षा है वहां हिंसा होगी, जहां महत्वाकांक्षा है वहां घृणा होगी, जहां महत्वाकांक्षा है वहां युद्ध होगा। पुरुष का सारा चित्त एंबीशन से भरा हुआ है। स्त्री के चित्त में एंबीशन नहीं है, महत्वाकांक्षा नहीं है, बल्कि प्रेम है। और हमारी पूरी सभ्यता प्रेम से बिलकुल शून्य है, प्रेम से बिलकुल रिक्त है, प्रेम की उसमें कोई जगह नहीं है। पुरुष ने अपने ही ढंग से पूरी बात निर्मित कर ली है। उसकी सारी शिक्षा भी उसने अपने ढंग से निर्मित कर ली है। उसने जीवन की जो संरचना की है वह अपने ही ढंग से की है। उसमें युद्ध प्रमुख है, उसमें संघर्ष प्रमुख है, उसमें तलवार प्रमुख है।

यहां तक कि अगर कोई स्त्री भी तलवार लेकर खड़ी हो जाती है तो पुरुष उसे बहुत आदर देता है। जोन ऑफ आर्क को, झांसी की रानी लक्ष्मी को पुरुष बहुत आदर देता है। इसलिए नहीं कि वे बहुत कीमती स्त्रियां थीं, बल्कि इसलिए कि वे पुरुष जैसी स्त्रियां थीं। वह उनकी मूर्तियां खड़ी करता है चौरस्तों पर। वह गीत गाता है: खूब लड़ी मर्दानी, झांसी वाली रानी थी। वह कहता है कि वह मर्दानी थी, इसलिए आदर देता है। लेकिन अगर कोई पुरुष जनाना हो तो अनादर करता है, आदर नहीं देता। स्त्री मर्दानी हो तो आदर देता है। स्त्री तलवार लेकर लड़ती हो, सैनिक बनती हो, तो पुरुष के मन में सम्मान है। पुरुष के मन में हिंसा के और महत्वाकांक्षा के अतिरिक्त किसी बात का कोई सम्मान नहीं है।

यह जो पुरुष अधूरा है, सारी शिक्षा भी उसी पुरुष के लिए निर्मित हुई है। हजारों वर्षों तक स्त्री को कोई शिक्षा नहीं दी गई। एक बड़ी भूल थी कि स्त्री अशिक्षित रह जाए। फिर कुछ वर्षों से स्त्री को शिक्षा दी जा रही है। और अब दूसरी भूल की जा रही है कि स्त्री को पुरुषों जैसी शिक्षा दी जा रही है। यह अशिक्षित स्त्री से भी खतरनाक स्त्री को पैदा करेगी। अशिक्षित स्त्री कम से कम स्त्री थी। शिक्षित स्त्री पुरुष के ज्यादा करीब आ जाती है, स्त्री कम रह जाती है। क्योंकि जिस शिक्षा से गुजरती है उसका मौलिक निर्माण पुरुष के लिए हुआ है। एक ऐसी स्त्री पैदा हो रही है सारी दुनिया में, जो अगर सौ दो सौ वर्ष इसी तरह की शिक्षा चलती रही तो अपने समस्त स्त्री-धर्म को खो देगी। उसके जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, उसकी प्रतिभा में जो भी कीमती है, उसके स्वभाव में जो भी सत्य है, वह सब विनष्ट हो जाएगा।

स्त्री शिक्षित होनी चाहिए। लेकिन उस तरह की शिक्षा में नहीं जो पुरुष की है। स्त्री के लिए ठीक स्त्री जैसी शिक्षा विकसित होनी जरूरी है। यह हमारे ध्यान में नहीं है और अभी मनुष्य-जाति के किन्हीं विचारकों के ध्यान में बहुत स्पष्ट नहीं है कि नारी की शिक्षा पुरुष से बिलकुल ही भिन्न शिक्षा होगी।

नारी भिन्न है।

मैं आपको यह कहना चाहता हूं, स्त्री और पुरुष समान आदर के पात्र हैं, लेकिन समान बिलकुल भी नहीं हैं, बिलकुल असमान हैं। स्त्री स्त्री है, पुरुष पुरुष है। और उन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। इस फर्क को अगर ध्यान में न रखा जाए तो जो भी शिक्षा होगी वह स्त्री के लिए बहुत आत्मघाती होने वाली है। वह स्त्री को नष्ट करने वाली होगी। स्त्री और पुरुष मौलिक रूप से भिन्न हैं। और उनकी यह जो मौलिक भिन्नता है, यह जो पोलेरिटी है, जैसे उत्तर और दक्षिण ध्रुव भिन्न हैं, जैसे बिजली के निगेटिव और पाजिटिव पोल भिन्न हैं, यह जो इतनी पोलेरिटी है, इतनी भिन्नता है, इसी की वजह से उनके बीच इतना आकर्षण है। इसी के कारण वे एक-दूसरे के सहयोगी और साथी और मित्र बन पाते हैं। यह असमानता जितनी कम होगी, यह भिन्नता जितनी कम होगी, यह दूरी जितनी कम होगी, उतना ही खतरनाक है मनुष्य के लिए।

मेरी दृष्टि में, स्त्रियों को पुरुषों जैसा बनाने वाली शिक्षा, सारी दुनिया में हर, एक-एक बच्चे तक पहुंचाई जा रही है। पुरुष तो पहले से ही विक्षिप्त सभ्यता को जन्म दिया है। एक आशा है कि स्त्री एक नई सभ्यता की उन्नायक बने। लेकिन वह आशा भी समाप्त हो जाएगी अगर स्त्री भी पुरुष की भांति दीक्षित हो जाती है।

मेरी दृष्टि में, स्त्री को गणित की नहीं, संगीत की और काव्य की शिक्षा ही उपयोगी है। उसे इंजीनियर बनाने की कोई भी जरूरत नहीं। इंजीनियर वैसे ही जरूरत से ज्यादा हैं। पुरुष पर्याप्त हैं इंजीनियर होने को। स्त्री को कुछ और होने की जरूरत है। क्योंकि अकेले इंजीनियरों से और अकेले गणितज्ञों से जीवन समृद्ध नहीं होता। उनकी जरूरत है, उनकी उपयोगिता है। लेकिन वे ही जीवन के लिए पर्याप्त नहीं हैं। जीवन की खुशी किन्हीं और बातों पर निर्भर करती है। बड़े से बड़ा इंजीनियर और बड़े से बड़ा गणितज्ञ भी जीवन में उतनी खुशी नहीं जोड़ पाता जितना गांव में एक बांसुरी बजाने वाला जोड़ देता है।

मनुष्य-जाति की खुशी बढ़ाने वाले लोग, मनुष्य के जीवन में आनंद के फूल खिलाने वाले लोग वे नहीं हैं जो प्रयोगशालाओं में जीवन भर प्रयोग ही करते रहते हैं। उनसे भी ज्यादा वे लोग हैं जो जीवन के गीत गाते हैं और जीवन के काव्य को अवतरित करते हैं।

मनुष्य जीता किसलिए है? काम के लिए? फैक्ट्री चलाने के लिए? रास्ते बनाने के लिए? मनुष्य रास्ते बनाता है, फैक्ट्री भी चलाता है, दुकान भी चलाता है, इसलिए कि इन सब से एक व्यवस्था बन सके और उस व्यवस्था में वह आनंद, शांति और प्रेम को पा सके। वह जीता हमेशा प्रेम और आनंद के लिए है। लेकिन कई बार ऐसा हो जाता है कि साधनों की चेष्टा में हम इतने संलग्न हो जाते हैं कि साध्य ही भूल जाता है।

मेरी दृष्टि में, पुरुष की सारी शिक्षा साधन की शिक्षा है। स्त्री की सारी शिक्षा साध्य की शिक्षा होनी चाहिए, साधन की नहीं। ताकि वह पुरुष के अधूरेपन को पूरा कर सके। वह पुरुष के लिए परिपूरक हो सके। वह पुरुष के जीवन में जो अधूरापन है, जो कमी है, उसे भर सके। पुरुष फैक्ट्रियां खड़ी कर लेगा, बगीचे कौन लगाएगा? पुरुष बड़े मकान खड़े कर लेगा, लेकिन उन मकानों में गीत कौन गुंजाएगा? पुरुष एक दुनिया बना लेगा जो मशीनों की होगी, लेकिन उन मशीनों के बीच फूलों की जगह कौन बनाएगा?

स्त्री के व्यक्तित्व के प्रेम को कितना गहरा कर सके, ऐसी शिक्षा चाहिए। ऐसी शिक्षा चाहिए जो उसके जीवन को और भी सृजनात्मक प्रेम की तरफ ले जा सके।

ओशो

Sunday, April 24, 2011

सभी धर्म कामवासना के विरोध में क्यों हैं?






यह जीवन के सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है, क्योंकि यह मूल जीवन-ऊर्जा से संबंधित है। कामवासना...यह शब्द ही अत्यंत निंदित हो गया है। क्योंकि समस्त धर्म उन सब चीजों के दुश्मन हैं, जिनसे मनुष्य आनंदित हो सकता है, इसलिए काम इतना निंदित किया गया है। उनका न्यस्त स्वार्थ इसमें था कि लोग दुखी रहें, उन्हें किसी तरह की शांति, थोड़ी सी भी सांत्वना, और इस रूखे-सूखे मरुस्थल में क्षण भर को भी मरूद्यान की हरियाली पाने की संभावना शेष न रहे। धर्मों के लिए यह परम आवश्यक था कि मनुष्य के सुखी होने की पूरी संभावना नष्ट कर दी जाए।

यह उनके लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों था? यह महत्वपूर्ण था क्योंकि वे तुम्हें, तुम्हारे मन को किसी और दिशा में मोड़ना चाहते थे-परलोक की ओर। यदि तुम सच में ही यहां आनंदित हो-इसी लोक में, तो भला तुम क्यों किसी परलोक की चिंता करोगे? परलोक के अस्तित्व के लिए तुम्हारा दुखी होना अत्यंत आवश्यक है। उसका स्वयं अपने आप में कोई अस्तित्व नहीं है, उसका अस्तित्व है तुम्हारे दुख में, तुम्हारी पीड़ा में, तुम्हारे विषाद में।

दुनिया के सारे धर्म तुम्हारे अहित करते रहे हैं। वे ईश्वर के नाम पर, सुंदर और अच्छे शब्दों की आड़ में तुममें और अधिक पीड़ा और अधिक संताप, और अधिक घृणा, और अधिक क"ोध, और अधिक घाव पैदा करते रहे हैं। वे प्रेम की बातचीत करते हैं, मगर तुम्हारे प्रेमपूर्ण हो सकने की सारी संभावनाओं को मिटा देते हैं।

मैं काम का शत्रु नहीं हूं। मेरी दृष्टि में काम उतना ही पवित्र है, जितना जीवन में शेष सब पवित्र है। असल में न कुछ पवित्र है, न कुछ अपवित्र है; जीवन एक है-सब विभाजन झूठे हैं, और काम जीवन का केंद्र बिंदु है।

इसलिए तुम्हें समझना पड़ेगा कि सदियों-सदियों से क्या होता आ रहा है। जैसे ही तुम काम को दबाते हो, तुम्हारी ऊर्जा स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए नये-नये मार्ग खोजना प्रारंभ कर देती है। ऊर्जा स्थिर नहीं रह सकती। जीवन के आधारभूत नियमों में से एक है कि ऊर्जा सदैव गत्यात्मक होती है, गतिशीलता का नाम ही ऊर्जा है। वह रुक नहीं सकती, ठहर नहीं सकती। यदि उसके साथ जबरदस्ती की गई, एक द्वार बंद किया गया, तो वह दूसरे द्वारों को खोल लेगी, लेकिन उसे बांधकर नहीं रखा जा सकता। यदि ऊर्जा का स्वाभाविक प्रवाह अवरुद्ध किया गया, तो वह किसी अप्राकृतिक मार्ग से बहने लगेगी। यही कारण है कि जिन समाजों ने काम का दमन किया, वे अधिक संपन्न और समृद्ध हो गए। जब तुम काम का दमन करते हो, तो तुम्हें अपने प्रेम-पात्र को बदलना होगा। अब स्त्री से प्रेम करना तो खतरनाक है, वह तो नरक का द्वार है। चूंकि सारे शास्त्र पुरुषों ने लिखे हैं, इसलिए सिर्फ स्त्री ही नरक का मार्ग है। पुरुषों के बारे में क्या खयाल है?

मैं हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों से कहता रहा हूं कि अगर स्त्री नरक का मार्ग है, तब तो फिर केवल पुरुष ही नरक जा सकते हैं, स्त्री तो जा ही नहीं सकती। मार्ग तो सदा अपनी जगह रहता है, वह तो कहीं आवागमन नहीं करता। लोग ही उस पर आवागमन करते हैं। यूं कहने को तो हम कहते हैं कि यह रास्ता फलां जगह जाता है, लेकिन इसमें भाषा की भूल है। रास्ता तो कहीं आता-जाता नहीं, अपनी जगह आराम से पड़ा रहता है, लोग ही उस पर आते-जाते हैं। यदि स्त्रियां नरक का मार्ग हैं, तब तो निश्चित ही नरक में केवल पुरुष ही पुरुष भरे होंगे। नरक “सिर्फ पुरुषों का क्लब” होगा।

स्त्री नरक का मार्ग नहीं है। लेकिन एक बार तुम्हारे दिमाग में यह गलत संस्कार बैठ जाए, तो तुम किसी और वस्तु में स्त्री को प्रक्षेपित करने लगोगे; फिर तुम्हें कोई और प्रेम-पात्र चाहिए। धन तुम्हारा प्रेम-पात्र बन सकता है। लोग पागलों की तरह धन-दौलत से चिपके हैं, जोरों से पकड़े हैं, क्यों? इतना लोभ और लालच क्यों है? क्योंकि दौलत ही उनकी प्रेमिका बन गई। उन्होंने अपनी सारी जीवन ऊर्जा धन की ओर मोड़ ली।

अब यदि कोई उनसे धन त्यागने को कहे, तो वे बड़ी मुसीबत में पड़ जाएंगे। फिर राजनीति से उनका प्रेम-संबंध जुड़ जाएगा। राजनीति में सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ते जाना ही उनका एकमात्र लक्ष्य हो जाएगा। प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पद की ओर, राजनीतिज्ञ ठीक उसी लालसा से देखता है, जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका की ओर देखता है। यह विकृति है।

कोई व्यक्ति किन्हीं और दिशाओं में जा सकता है, जैसे शिक्षा; तब पुस्तकें उसकी प्रेम की वस्तुएं हो जाती हैं। कोई आदमी धार्मिक बन सकता है, तब परमात्मा उसका प्रेम-पात्र बन जाता है...तुम अपने प्रेम को किसी भी काल्पनिक चीज पर प्रक्षेपित कर सकते हो, लेकिन स्मरण रहे, उससे तुम्हें परितृप्ति नहीं मिल सकती।   
                                 -ओशो

Saturday, April 23, 2011

एक कलाकार जब प्रेमी बनता है.......................................


 प्रश्न : एक कलाकार होने के नाते, मैं बहुत ही आसानी से अपनी भावनाओं और प्रेम को अपने कार्य में उंड़ेल देता हूं। यही अहसास अपने संगी-साथियों के साथ मैं क्यों नहीं बांट पाता? 




शिल्पकार बनना आसान है क्योंकि तुम निर्जीव वस्तुओं को देख रहे हो। तुम सुंदर मूर्ति बना सकते हो लेकिन वे मूर्तियां मृत हैं। तुम उनके साथ संबंधित नहीं हो सकते, तुम जीवंत हो। जीवन और मृत्यु के बीच संवाद संभव नहीं है।
तुम प्रशंसा कर सकते हो; तुम आनंद मना सकते हो; यह तुम्हारा सृजन है। तुम संतुष्ट हो सकते हो; जो कुछ भी तुम चाहो, करने में तुम सफल हुए। लेकिन एक बात याद रखो : दूसरी तरफ, वहां कोई नहीं है। तुम अकेले हो।
इस स्थिति के कारण, यहां ऐसे लोग हैं जो अपने कुत्तों को प्रेम कर सकते हैं, जो अपने बगीचों को प्रेम कर सकते हैं, जो अपनी कारों को प्रेम कर सकते हैं, वे दुनिया में मानव के अतिरिक्त हर चीज को प्रेम कर सकते हैं। क्योंकि मनुष्य का मतलब है कि तुम अकेले नहीं हो, दूसरा वहां है। वह संवाद है। मूर्ति के साथ, यह एकालाप है। मूर्ति कुछ भी कहने वाली नहीं है, वह तुम्हारी आलोचना करने वाली नहीं है, तुम्हारे ऊपर आधिपत्य जमाने वाली नहीं है। तुम मूर्ति पर आधिपत्य रखते हो; तुम उसे बाजार में बेच सकते हो। लेकिन यह तुम मनुष्य के साथ नहीं कर सकते। यह समस्या है।

जब तुम मानव जाति से संबंधित होना शुरू करते हो, तुम्हें यह मानना होगा कि वे वस्तुएं नहीं हैं, वे चेतनाएं हैं। तुम उन पर प्रभुत्व नहीं जमा सकते...हालांकि सभी यह करने की कोशिश कर रहे हैं, और अपने सारे जीवन को नष्ट कर रहे हैं। जिस क्षण तुम किसी मानव पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश करते हो, तुम शत्रु पैदा करते हो, क्योंकि वह मनुष्य भी प्रभुत्व जमाना चाहता है। तुम इसे प्रेम कह सकते हो, तुम इसे दोस्ती कह सकते हो, लेकिन दोस्ती और प्रेम और भाईचारे के पर्दे के पीछे गहरे में वहां शक्ति की चाह है। तुम प्रभुत्व करना चाहते हो; तुम अधीन नहीं होना चाहते।
मनुष्यों के साथ, तुम सतत संघर्ष में होओगे। जितने करीब तुम होओगे उतना ही संघर्ष तुम्हें कष्ट देगा। यहां हजारों लोग हैं जो मनुष्यों के साथ रिश्तों के कारण इतने आहत हुए हैं कि वे मनुष्यों के साथ प्रेम, दोस्ती से दूर चले गए हैं। वे वस्तुओं की तरफ मुड़ गए हैं। यह आसान है : जो भी तुम चाहते हो वह दूसरा हमेशा करना चाहता है।
तुम कलाकार हो, तुम मूर्ति बनाते हो। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि तुम क्या कर रहे हो? तुम संगमरमर से टुकड़े निकाल रहे हो; जो तुम मनुष्यों के साथ नहीं कर सकते, लेकिन लोग मनुष्यों के साथ भी यह कर रहे हैं। माता-पिता अपने बच्चों के पंख काट रहे हैं, उनकी स्वतंत्रता काट रहे हैं, उनकी निजता काट रहे हैं। प्रेमी एक-दूसरे को सतत काट रहे हैं।
मनुष्य के साथ प्रेम में होना आसान बात नहीं है। दुनिया में प्रेम संबंध सबसे कठिन है ; इसकी बस साधारण सी वजह यह है कि दो चेतनाएं, दो जीवंत मनुष्य, किसी भी तरह की गुलामी को सहन नहीं कर सकते।
जब माता-पिता अपने बच्चों को कहते हैं, "यह मत करो!' छोटे से बच्चे को भी ठेस पहुंचती है, अपमानित महसूस करता है, बेइज्जती महसूस करता है। और उसे ऐसा होगा यदि उसमें किसी प्रकार का साहस है।
तुम वस्तुओं के ऊपर, चीजों के ऊपर कार्य कर रहे हो। वे हां नहीं कह सकती, वे ना नहीं कह सकती। जो कुछ भी उनके साथ तुम करना चाहते हो, तुम कर सकते हो, लेकिन मनुष्य के साथ नहीं कर सकते। यह तुम्हारी गलती है कि अभी भी तुम इतने प्रौढ़ नहीं हुए कि समझ पाओ कि मनुष्य के साथ, यदि तुम प्रेमपूर्ण रिश्ता चाहते हो तो तुम्हें सारी शक्ति की राजनीति को भूल जाना चाहिए। तुम बस मित्र हो सकते हो, न तो दूसरे पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश करते, न ही दूसरे द्वारा प्रभुत्व जमाने देना चाहते हो। यह संभव है यदि तुम्हारे जीवन में एक तरह का ध्यान हो। वर्ना, यह संभव नहीं है।
मनुष्य को प्रेम करना दुनिया में बहुत कठिन कार्य है क्योंकि जिस क्षण तुम अपना प्रेम बताना शुरू करते हो, दूसरा शक्ति की कामना करने लगेगा। वह जानता है या जानती है कि तुम उस पर आश्रित हो। तुम मनोवैज्ञानिक रूप से और आध्यात्मिक रूप से गुलाम हो सकते हो और कोई भी गुलाम नहीं होना चाहता। लेकिन तुम्हारे सारे मानवीय रिश्ते गुलामी में बदल जाते हैं।
कोई भी मूर्ति तुम्हें गुलाम नहीं बनाएगी। इसके विपरीत, मूर्ति तुम्हें परम शिल्पकार बनाएगी, वह तुम्हें सृजनकार बनाएगी, कलाकार बनाएगी। वहां किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं है। प्रेम की असली परीक्षा मनुष्यों के साथ होती है।
वह व्यक्ति सचमुच प्रतिभावान होगा यदि वह मनुष्य के साथ सहजता से रिश्ता बना सकता है। इसके लिए बहुत गहन अंतर्दृष्टि की जरूरत होती है। मूर्ति बनाना या सुंदर चित्रकारी करना एक बात है; वे रंग ऐसा नहीं कहेंगे कि "मैं कैनवास के कोने में नहीं जाना चाहता, मैं बस अस्वीकार करता हूं!' जहां कहीं तुम उसे चाहते हो, रंग उपलब्ध है। लेकिन यह मनुष्य के साथ आसान नहीं है।
हर मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है कि वह किसी के द्वारा गुलाम नहीं बनाया जाए , लेकिन जन्म कर्तव्य भी है कि किसी के ऊपर प्रभुत्व न जमाए। और सिर्फ तब ही, मित्रता खिल सकती है।
प्रेम के पास स्पष्ट देखने की नजर होनी चाहिए। प्रेम को सब तरह की गंदगी को साफ करने की जरूरत होती है जो तुम्हारे मन में है : ईर्ष्या, क्रोध, प्रभुत्व जमाने की चाह।

मैंने सुना है...शादी के रजिस्ट्रार आफिस में, एक जोड़ा शादी के लिए आया। उन्होंने फॉर्म भरे। स्त्री ने पुरुष की तरफ देखा, वे प्रेमी थे, वे अपने परिवारों के खिलाफ रजिस्टर आफिस आए थे, क्योंकि भारत में, शादी रजिस्ट्रार के आफिस में नहीं होती है। कानूनी रूप से तुम कर सकते हो लेकिन वह तब ही होती है जब तुम परिवार के खिलाफ करते हो, समाज के खिलाफ करते हो।
वे दो लोग निश्चित ही गहरे में प्यार में रहे होंगे। उन्होंने समाज के खिलाफ, धर्म के खिलाफ, माता-पिता के खिलाफ, परिवार के खिलाफ विद्रोह किया। उन्होंने हर चीज का जोखिम लिया और वे शादी करने ही वाले थे। स्त्री ने पुरुष की तफर देखा जो फॉर्म भर रहा था, क्योंकि उसने अपना भर लिया था; और तब अचानक उसने रजिस्ट्रार को कहा, "मैं तत्काल तलाक चाहती हूं।'
वह बोला, "क्या हुआ? तुम शादी के लिए फॉर्म भर रही हो। हनीमून भी नहीं हुआ है। सच तो यह है कि अभी शादी भी नहीं हुई है क्योंकि अभी मैंने सील नहीं लगाई है। तुम अचानक तलाक क्यों चाहती हो?'
वह बोली, "मैं इस पुरुष से नफरत करती हूं!'
रजिस्ट्रार बोला, "यह अजीब बात है! तुम इसे यहां लेकर आई हो?'
वह बोली, "हां, मैं उसे यहां लेकर आई हूं। मैं इसे प्यार किया करती थी, लेकिन जब मैंने उसका फॉर्म देखा...उसने इतने बड़े शब्दों में हस्ताक्षर किए! वह देख रहा था जब मैं हस्ताक्षर कर रही थी। मैंने उसी तरह से हस्ताक्षर किए जैसे कि मैं हमेशा करती हूं, और इसने तीन गुना बड़े शब्दों में हस्ताक्षर किए; लगभग आधे फॉर्म में इसके हस्ताक्षर हैं! मैं इस आदमी के साथ जीना नहीं चाहती, इसने अपना प्रभुत्व, अपनी ताकत बता दी है।'
रजिस्ट्रार बोला, "तब किसी तलाक की जरूरत नहीं है। बस अपने फॉर्म को कचरे के डिब्बे में फेंक दो, क्योंकि अभी मैंने उन पर मुहर नहीं लगाई है, और यहां से चले जाओ।'
इतनी छोटी सी बात कि पुरुष ने बड़े शब्दों में हस्ताक्षर कर दिया! लेकिन यह बड़ा प्रतीकात्मक है। यह बताता है कि वह पुरुष दंभ से भरा है।

तुम्हारे सारे जीवन के बारे में क्या है? हर बात समस्या है, हर बात में द्वंद्व है। कारण यह है कि हमने यह विचार स्वीकार लिया है कि हम जानते हैं कि प्रेम कैसे किया जाता है। हम नहीं जानते हैं। हम जानवरों से आए हैं; जानवर प्रेम नहीं करते हैं। प्रेम मनुष्य जीवन में बहुत नई बात है। जानवर पैदा करते हैं लेकिन वे प्रेम नहीं करते हैं। तुम भैंसों में रोमियो और जुलियट, लैला और मजनू, शिरी और फरहाद, सोनी और महिवाल नहीं पाओगे। कोई भी भैंसें इन रोमांटिक बातों में रुचि नहीं रखती हैं; वे बड़ी व्यावहारिक होती हैं, वे प्रजनन करती हैं, और प्रकृति भैंसों के साथ पूरी तरह से संतुष्ट है, याद रखना। हो सकता है कि प्रकृति मनुष्य को नष्ट करने की कोशिश कर रही हो लेकिन भैंसों और गधों और बंदरों को नष्ट करने का प्रयास नहीं कर रही है, नहीं। वे कतई समस्या नहीं हैं।
मानव चेतना के साथ प्रेम नई घटना है जो पैदा होती है। तुम्हें इसे सीखना होगा।
सुंदर चित्र, कविता, मूर्ति, संगीत, नृत्य सृजित करो; यह सब तुम्हारे हाथ में है। लेकिन जब तुम मनुष्य के संपर्क में आते हो, तुम्हें समझना होगा कि दूसरी तरफ भी उसी तरह की चेतना है। जिस व्यक्ति को तुम प्रेम करते हो उसे सम्मान और गौरव देना होगा। यह कारण है कि तुम मनुष्य के साथ संबंधित नहीं हो सकते।
मनुष्य और प्रेम के बारे में भूल जाओ; तुम बस ध्यान करो। यह तुम्हें अंतर्दृष्टि, दर्शन, स्पष्टता और बांटने की ऊर्जा देगा।
अपनी अतिशय ऊर्जा को बांटने का नाम प्रेम है। तुम्हारे पास बहुत अधिक है, तुम उससे बोझिल हो। तुम उसे बांटना चाहते हो उन लोगों के साथ जिन्हें तुम पसंद करते हो। तुम्हारा प्रेम--जिसे तुम प्रेम कहते हो--यह बांटना नहीं है, यह झपटना है।
तुम्हें प्रेम का अर्थ बदलना होगा। यह ऐसी बात नहीं है कि तुम किसी दूसरे से इसे लेने की कोशिश कर रहे हो। और यह प्रेम का सारा इतिहास रहा है; सभी दूसरे से, जितना हो सके उतना, इसे लेने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों ही लेने की कोशिश कर रहे हैं, और स्वाभाविक ही, किसी को भी कुछ भी नहीं मिल रहा है। प्रेम कोई ऐसी बात नहीं है कि जिसे लिया जा सके। प्रेम तो देने की बात है। लेकिन तुम तब ही दे सकते हो जब तुम्हारे पास यह हो। क्या तुम्हारे भीतर प्रेम है? क्या तुमने कभी यह प्रश्न पूछा है? मौन बैठ कर, तुमने कभी देखा है? तुम्हारे पास कोई प्रेम की ऊर्जा है देने के लिए?
तुम्हारे पास नहीं है, न ही किसी दूसरे पास है। तब तुम प्रेम संबंध में फंस जाते हो। दोनो ही दिखावा कर रहे हैं, दिखावा कर रहे हैं कि वे तुम्हें स्वर्ग देंगे। दोनों ही एक-दूसरे को भरोसा दिला रहे हैं कि "एक बार तुम मेरे साथ शादी कर लोगे, हमारी रातें हजारों अरेबीयन रातों को भुला देंगी, हमारे दिन स्वर्णिम होंगे।'
लेकिन तुम नहीं जानते कि तुम्हारे पास देने को कुछ भी नहीं है। ये सारी बातें जो तुम कह रहे हो वह लेने के लिए हैं। और दूसरा भी यही बात कर रहा है। एक बार तुम शादी कर लेते हो, तब वहां निश्चित ही परेशानी होने वाली है ; दोनों ही हजारों अरेबिनयन रातों का इंतजार कर रहे हैं और एक भारतीय रात भी नहीं घट रही है! तब गुस्सा है, रोष है जो धीरे-धीरे जहरीला बन जाता है।
प्रेम का नफरत में बदल जाना बहुत सरल सी घटना है, क्योंकि सभी महसूस करते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है। तुम समुद्र किनारे, सिनेमा हॉल में, नृत्य स्थल पर एक चेहरा बताते हो। आधे या एक घंटे के लिए समुद्र किनारे बैठे हुए एक-दूसरे का हाथ हाथ में लिए आने वाले सुंदर जीवन के सपने देखना एक बात है। लेकिन एक बार जब तुम शादी कर लेते हो, वह सब तुम अपेक्षा कर रहे थे, सपने देख रहे थे, वाष्पीभूत होने लगेंगे।

मेरा तुम्हें यह सुझाव है कि : ध्यान करो। अधिक से अधिक शांत होओ, मौन होओ, स्थिर होओ। अपने भीतर शांति को पैदा होने दो। वह हजारों तरह से तुम्हें मदद करेगा...सिर्फ प्रेम में ही नहीं, यह तुम्हें अधिक सुंदर मूर्ति बनाने में भी मदद करेगा। क्योंकि जो व्यक्ति मनुष्य को प्रेम नहीं कर सकता; वह कैसे सृजन कर सकता है? वह क्या सृजन करेगा ? प्रेमविहिन हृदय वास्तविक सृजनशील नहीं हो सकता। वह ध्यान कर सकता है, लेकिन वह सृजन नहीं कर सकता।
सारा सृजन प्रेम, समझ और मौन है।
शिल्पकार बनना आसान है क्योंकि तुम निर्जीव वस्तुओं को देख रहे हो। तुम सुंदर मूर्ति बना सकते हो लेकिन वे मूर्तियां मृत हैं। तुम उनके साथ संबंधित नहीं हो सकते, तुम जीवंत हो। जीवन और मृत्यु के बीच संवाद संभव नहीं है।

तुम प्रशंसा कर सकते हो; तुम आनंद मना सकते हो; यह तुम्हारा सृजन है। तुम संतुष्ट हो सकते हो; जो कुछ भी तुम चाहो, करने में तुम सफल हुए। लेकिन एक बात याद रखो : दूसरी तरफ, वहां कोई नहीं है। तुम अकेले हो।

इस स्थिति के कारण, यहां ऐसे लोग हैं जो अपने कुत्तों को प्रेम कर सकते हैं, जो अपने बगीचों को प्रेम कर सकते हैं, जो अपनी कारों को प्रेम कर सकते हैं, वे दुनिया में मानव के अतिरिक्त हर चीज को प्रेम कर सकते हैं। क्योंकि मनुष्य का मतलब है कि तुम अकेले नहीं हो, दूसरा वहां है। वह संवाद है। मूर्ति के साथ, यह एकालाप है। मूर्ति कुछ भी कहने वाली नहीं है, वह तुम्हारी आलोचना करने वाली नहीं है, तुम्हारे ऊपर आधिपत्य जमाने वाली नहीं है। तुम मूर्ति पर आधिपत्य रखते हो; तुम उसे बाजार में बेच सकते हो। लेकिन यह तुम मनुष्य के साथ नहीं कर सकते। यह समस्या है।

जब तुम मानव जाति से संबंधित होना शुरू करते हो, तुम्हें यह मानना होगा कि वे वस्तुएं नहीं हैं, वे चेतनाएं हैं। तुम उन पर प्रभुत्व नहीं जमा सकते...हालांकि सभी यह करने की कोशिश कर रहे हैं, और अपने सारे जीवन को नष्ट कर रहे हैं। जिस क्षण तुम किसी मानव पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश करते हो, तुम शत्रु पैदा करते हो, क्योंकि वह मनुष्य भी प्रभुत्व जमाना चाहता है। तुम इसे प्रेम कह सकते हो, तुम इसे दोस्ती कह सकते हो, लेकिन दोस्ती और प्रेम और भाईचारे के पर्दे के पीछे गहरे में वहां शक्ति की चाह है। तुम प्रभुत्व करना चाहते हो; तुम अधीन नहीं होना चाहते।

मनुष्यों के साथ, तुम सतत संघर्ष में होओगे। जितने करीब तुम होओगे उतना ही संघर्ष तुम्हें कष्ट देगा। यहां हजारों लोग हैं जो मनुष्यों के साथ रिश्तों के कारण इतने आहत हुए हैं कि वे मनुष्यों के साथ प्रेम, दोस्ती से दूर चले गए हैं। वे वस्तुओं की तरफ मुड़ गए हैं। यह आसान है : जो भी तुम चाहते हो वह दूसरा हमेशा करना चाहता है।

तुम कलाकार हो, तुम मूर्ति बनाते हो। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि तुम क्या कर रहे हो? तुम संगमरमर से टुकड़े निकाल रहे हो; जो तुम मनुष्यों के साथ नहीं कर सकते, लेकिन लोग मनुष्यों के साथ भी यह कर रहे हैं। माता-पिता अपने बच्चों के पंख काट रहे हैं, उनकी स्वतंत्रता काट रहे हैं, उनकी निजता काट रहे हैं। प्रेमी एक-दूसरे को सतत काट रहे

मनुष्य के साथ प्रेम में होना आसान बात नहीं है। दुनिया में प्रेम संबंध सबसे कठिन है ; इसकी बस साधारण सी वजह यह है कि दो चेतनाएं, दो जीवंत मनुष्य, किसी भी तरह की गुलामी को सहन नहीं कर सकते।

जब माता-पिता अपने बच्चों को कहते हैं, "यह मत करो!' छोटे से बच्चे को भी ठेस पहुंचती है, अपमानित महसूस करता है, बेइज्जती महसूस करता है। और उसे ऐसा होगा यदि उसमें किसी प्रकार का साहस है।

तुम वस्तुओं के ऊपर, चीजों के ऊपर कार्य कर रहे हो। वे हां नहीं कह सकती, वे ना नहीं कह सकती। जो कुछ भी उनके साथ तुम करना चाहते हो, तुम कर सकते हो, लेकिन मनुष्य के साथ नहीं कर सकते। यह तुम्हारी गलती है कि अभी भी तुम इतने प्रौढ़ नहीं हुए कि समझ पाओ कि मनुष्य के साथ, यदि तुम प्रेमपूर्ण रिश्ता चाहते हो तो तुम्हें सारी शक्ति की राजनीति को भूल जाना चाहिए। तुम बस मित्र हो सकते हो, न तो दूसरे पर प्रभुत्व जमाने की कोशिश करते, न ही दूसरे द्वारा प्रभुत्व जमाने देना चाहते हो। यह संभव है यदि तुम्हारे जीवन में एक तरह का ध्यान हो। वर्ना, यह संभव नहीं है।

मनुष्य को प्रेम करना दुनिया में बहुत कठिन कार्य है क्योंकि जिस क्षण तुम अपना प्रेम बताना शुरू करते हो, दूसरा शक्ति की कामना करने लगेगा। वह जानता है या जानती है कि तुम उस पर आश्रित हो। तुम मनोवैज्ञानिक रूप से और आध्यात्मिक रूप से गुलाम हो सकते हो और कोई भी गुलाम नहीं होना चाहता। लेकिन तुम्हारे सारे मानवीय रिश्ते गुलामी में बदल जाते हैं।

कोई भी मूर्ति तुम्हें गुलाम नहीं बनाएगी। इसके विपरीत, मूर्ति तुम्हें परम शिल्पकार बनाएगी, वह तुम्हें सृजनकार बनाएगी, कलाकार बनाएगी। वहां किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं है। प्रेम की असली परीक्षा मनुष्यों के साथ होती है।

वह व्यक्ति सचमुच प्रतिभावान होगा यदि वह मनुष्य के साथ सहजता से रिश्ता बना सकता है। इसके लिए बहुत गहन अंतर्दृष्टि की जरूरत होती है। मूर्ति बनाना या सुंदर चित्रकारी करना एक बात है; वे रंग ऐसा नहीं कहेंगे कि "मैं कैनवास के कोने में नहीं जाना चाहता, मैं बस अस्वीकार करता हूं!' जहां कहीं तुम उसे चाहते हो, रंग उपलब्ध है। लेकिन यह मनुष्य के साथ आसान नहीं है।

हर मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है कि वह किसी के द्वारा गुलाम नहीं बनाया जाए , लेकिन जन्म कर्तव्य भी है कि किसी के ऊपर प्रभुत्व न जमाए। और सिर्फ तब ही, मित्रता खिल सकती है।

प्रेम के पास स्पष्ट देखने की नजर होनी चाहिए। प्रेम को सब तरह की गंदगी को साफ करने की जरूरत होती है जो तुम्हारे मन में है : ईर्ष्या, क्रोध, प्रभुत्व जमाने की चाह।

मैंने सुना है...शादी के रजिस्ट्रार आफिस में, एक जोड़ा शादी के लिए आया। उन्होंने फॉर्म भरे। स्त्री ने पुरुष की तरफ देखा, वे प्रेमी थे, वे अपने परिवारों के खिलाफ रजिस्टर आफिस आए थे, क्योंकि भारत में, शादी रजिस्ट्रार के आफिस में नहीं होती है। कानूनी रूप से तुम कर सकते हो लेकिन वह तब ही होती है जब तुम परिवार के खिलाफ करते हो, समाज के खिलाफ करते हो।

वे दो लोग निश्चित ही गहरे में प्यार में रहे होंगे। उन्होंने समाज के खिलाफ, धर्म के खिलाफ, माता-पिता के खिलाफ, परिवार के खिलाफ विद्रोह किया। उन्होंने हर चीज का जोखिम लिया और वे शादी करने ही वाले थे। स्त्री ने पुरुष की तफर देखा जो फॉर्म भर रहा था, क्योंकि उसने अपना भर लिया था; और तब अचानक उसने रजिस्ट्रार को कहा, "मैं तत्काल तलाक चाहती हूं।'

वह बोला, "क्या हुआ? तुम शादी के लिए फॉर्म भर रही हो। हनीमून भी नहीं हुआ है। सच तो यह है कि अभी शादी भी नहीं हुई है क्योंकि अभी मैंने सील नहीं लगाई है। तुम अचानक तलाक क्यों चाहती हो?'

वह बोली, "मैं इस पुरुष से नफरत करती हूं!'

रजिस्ट्रार बोला, "यह अजीब बात है! तुम इसे यहां लेकर आई हो?'

वह बोली, "हां, मैं उसे यहां लेकर आई हूं। मैं इसे प्यार किया करती थी, लेकिन जब मैंने उसका फॉर्म देखा...उसने इतने बड़े शब्दों में हस्ताक्षर किए! वह देख रहा था जब मैं हस्ताक्षर कर रही थी। मैंने उसी तरह से हस्ताक्षर किए जैसे कि मैं हमेशा करती हूं, और इसने तीन गुना बड़े शब्दों में हस्ताक्षर किए; लगभग आधे फॉर्म में इसके हस्ताक्षर हैं! मैं इस आदमी के साथ जीना नहीं चाहती, इसने अपना प्रभुत्व, अपनी ताकत बता दी है।'

रजिस्ट्रार बोला, "तब किसी तलाक की जरूरत नहीं है। बस अपने फॉर्म को कचरे के डिब्बे में फेंक दो, क्योंकि अभी मैंने उन पर मुहर नहीं लगाई है, और यहां से चले जाओ।'

इतनी छोटी सी बात कि पुरुष ने बड़े शब्दों में हस्ताक्षर कर दिया! लेकिन यह बड़ा प्रतीकात्मक है। यह बताता है कि वह पुरुष दंभ से भरा है।

तुम्हारे सारे जीवन के बारे में क्या है? हर बात समस्या है, हर बात में द्वंद्व है। कारण यह है कि हमने यह विचार स्वीकार लिया है कि हम जानते हैं कि प्रेम कैसे किया जाता है। हम नहीं जानते हैं। हम जानवरों से आए हैं; जानवर प्रेम नहीं करते हैं। प्रेम मनुष्य जीवन में बहुत नई बात है। जानवर पैदा करते हैं लेकिन वे प्रेम नहीं करते हैं। तुम भैंसों में रोमियो और जुलियट, लैला और मजनू, शिरी और फरहाद, सोनी और महिवाल नहीं पाओगे। कोई भी भैंसें इन रोमांटिक बातों में रुचि नहीं रखती हैं; वे बड़ी व्यावहारिक होती हैं, वे प्रजनन करती हैं, और प्रकृति भैंसों के साथ पूरी तरह से संतुष्ट है, याद रखना। हो सकता है कि प्रकृति मनुष्य को नष्ट करने की कोशिश कर रही हो लेकिन भैंसों और गधों और बंदरों को नष्ट करने का प्रयास नहीं कर रही है, नहीं। वे कतई समस्या नहीं हैं।

मानव चेतना के साथ प्रेम नई घटना है जो पैदा होती है। तुम्हें इसे सीखना होगा।

सुंदर चित्र, कविता, मूर्ति, संगीत, नृत्य सृजित करो; यह सब तुम्हारे हाथ में है। लेकिन जब तुम मनुष्य के संपर्क में आते हो, तुम्हें समझना होगा कि दूसरी तरफ भी उसी तरह की चेतना है। जिस व्यक्ति को तुम प्रेम करते हो उसे सम्मान और गौरव देना होगा। यह कारण है कि तुम मनुष्य के साथ संबंधित नहीं हो सकते।

मनुष्य और प्रेम के बारे में भूल जाओ; तुम बस ध्यान करो। यह तुम्हें अंतर्दृष्टि, दर्शन, स्पष्टता और बांटने की ऊर्जा देगा।

अपनी अतिशय ऊर्जा को बांटने का नाम प्रेम है। तुम्हारे पास बहुत अधिक है, तुम उससे बोझिल हो। तुम उसे बांटना चाहते हो उन लोगों के साथ जिन्हें तुम पसंद करते हो। तुम्हारा प्रेम--जिसे तुम प्रेम कहते हो--यह बांटना नहीं है, यह झपटना है।

तुम्हें प्रेम का अर्थ बदलना होगा। यह ऐसी बात नहीं है कि तुम किसी दूसरे से इसे लेने की कोशिश कर रहे हो। और यह प्रेम का सारा इतिहास रहा है; सभी दूसरे से, जितना हो सके उतना, इसे लेने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों ही लेने की कोशिश कर रहे हैं, और स्वाभाविक ही, किसी को भी कुछ भी नहीं मिल रहा है। प्रेम कोई ऐसी बात नहीं है कि जिसे लिया जा सके। प्रेम तो देने की बात है। लेकिन तुम तब ही दे सकते हो जब तुम्हारे पास यह हो। क्या तुम्हारे भीतर प्रेम है? क्या तुमने कभी यह प्रश्न पूछा है? मौन बैठ कर, तुमने कभी देखा है? तुम्हारे पास कोई प्रेम की ऊर्जा है देने के लिए?

तुम्हारे पास नहीं है, न ही किसी दूसरे पास है। तब तुम प्रेम संबंध में फंस जाते हो। दोनो ही दिखावा कर रहे हैं, दिखावा कर रहे हैं कि वे तुम्हें स्वर्ग देंगे। दोनों ही एक-दूसरे को भरोसा दिला रहे हैं कि "एक बार तुम मेरे साथ शादी कर लोगे, हमारी रातें हजारों अरेबीयन रातों को भुला देंगी, हमारे दिन स्वर्णिम होंगे।'

लेकिन तुम नहीं जानते कि तुम्हारे पास देने को कुछ भी नहीं है। ये सारी बातें जो तुम कह रहे हो वह लेने के लिए हैं। और दूसरा भी यही बात कर रहा है। एक बार तुम शादी कर लेते हो, तब वहां निश्चित ही परेशानी होने वाली है ; दोनों ही हजारों अरेबिनयन रातों का इंतजार कर रहे हैं और एक भारतीय रात भी नहीं घट रही है! तब गुस्सा है, रोष है जो धीरे-धीरे जहरीला बन जाता है।

प्रेम का नफरत में बदल जाना बहुत सरल सी घटना है, क्योंकि सभी महसूस करते हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है। तुम समुद्र किनारे, सिनेमा हॉल में, नृत्य स्थल पर एक चेहरा बताते हो। आधे या एक घंटे के लिए समुद्र किनारे बैठे हुए एक-दूसरे का हाथ हाथ में लिए आने वाले सुंदर जीवन के सपने देखना एक बात है। लेकिन एक बार जब तुम शादी कर लेते हो, वह सब तुम अपेक्षा कर रहे थे, सपने देख रहे थे, वाष्पीभूत होने लगेंगे।

मेरा तुम्हें यह सुझाव है कि : ध्यान करो। अधिक से अधिक शांत होओ, मौन होओ, स्थिर होओ। अपने भीतर शांति को पैदा होने दो। वह हजारों तरह से तुम्हें मदद करेगा...सिर्फ प्रेम में ही नहीं, यह तुम्हें अधिक सुंदर मूर्ति बनाने में भी मदद करेगा। क्योंकि जो व्यक्ति मनुष्य को प्रेम नहीं कर सकता; वह कैसे सृजन कर सकता है? वह क्या सृजन करेगा ? प्रेमविहिन हृदय वास्तविक सृजनशील नहीं हो सकता। वह ध्यान कर सकता है, लेकिन वह सृजन नहीं कर सकता।

सारा सृजन प्रेम, समझ और मौन है।
-ओशो


Saturday, April 16, 2011

''जीना बिना भय के '' मैं मेरे आसपास एक कवच महसूस करता हूं जोकि मुझे लोगों के करीब आने से रोकता हैं। मुझे नहीं पता यह कहां से आ रहा है। इसे कैसे पिघला कर दूर करना है?







हर किसी के पास उस तरह का कवच है।

इसके लिए कारण हैं। सबसे पहले, बच्चा बिलकुल असहाय उस दुनिया में पैदा होता है जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता है। स्वभावत:जो अनजान है उसे सामना करने से उसे डर लगता है। वह अभी तक पूर्ण सुरक्षा के उन नौ महीनों को नहीं भूला है, खतरे से खाली, जब कोई समस्या नहीं थी, कोई जिम्मेदारी नहीं, कल के बारे में कोई चिंता नहीं।

हमारे लिए वे नौ महीने हैं लेकिन बच्चे के लिये अनंत काल हैं। वह कैलेंडर के बारे में कुछ नहीं जानता; वह मिनट, घंटे, दिन या महीने के बारे में कुछ भी नहीं जानता। वह पूर्ण सुरक्षा और संरक्षा में एक अनंत काल रहा है, बिना किसी जिम्मेदारी के, और फिर अचानक उसे एक अज्ञात दुनिया में डाल दिया, जहां वह दूसरों पर सभी चीजो के लिए निर्भर है। यह स्वाभाविक है कि उसे भय लगेगा। हर कोई बड़ा और अधिक शक्तिशाली है, और वह दूसरों की मदद के बिना नहीं रह सकता। वह जानता है कि वह निर्भर है, उसने अपनी स्वतंत्रता, अपनी आजादी खो दी है। छोटी-छोटी घटनायें उसे उस वास्तविकता का कुछ स्वाद दे सकती है जिसका वह भविष्य में सामना करने जा रहा है।

नेपोलियन बोनापार्ट नेल्सन से हार गया था, लेकिन वास्तव में गौरव नेल्सन को नहीं जाना चाहिए। नेपोलियन बोनापार्ट अपने बचपन की एक छोटी सी घटना से हार गया था। अब इतिहास चीजों को इस तरह नहीं देखता है, लेकिन मेरे लिए यह बिल्कुल साफ है।

जब वह सिर्फ छह महीने का था, एक जंगली बिल्ली उस पर कूद गयी। नौकरानी जो उसे देख रही थी घर में किसी चीज़ के लिए गयी, वह बगीचे में था, सुबह के सूर्य और ताजा हवा में लेटा था, और जंगली बिल्ली उस पर कूद गयी। उसने उसे नुकसान नहीं पहुंचाया था - शायद वह सिर्फ खिलवाड़ कर रही थी -- लेकिन बच्चे के दिमाग के लिए यह लगभग मौत थी। तब से, उसे बाघ या शेर का डर नहीं था, वह बिना किसी हथियार के एक शेर से लड़ सकता था, बिना किसी भय के । लेकिन बिल्ली? वह एक अलग मामला था। वह बिल्कुल असहाय था। बिल्ली देखकर वह लगभग जम जाता था, वह फिर एक छह महीने का छोटा बच्चा बन जाता था, बिना किसी सुरक्षा के, बिना किसी लड़ने की क्षमता के। उस छोटे बच्चे की आंखों में वह बिल्ली बहुत बड़ी लगती होगी, यह एक जंगली बिल्ली थी। हो सकता है बिल्ली ने बच्चे की आंखों में देखा ।

उसका मन इस घटना से इतना कुछ प्रभावित हुआ कि नेल्सन ने इसका उपयोग किया। नेल्सन की नेपोलियन से कोई तुलना नहीं थी, और नेपोलियन अपने जीवन में कभी हारा नहीं था, यह उसकी पहली और आखिरी हार थी। वह हार भी नहीं सकता था, लेकिन नेल्सन सेना के मोर्चे पर सत्तर बिल्लियों को ले आया था।

जिस क्षण नेपोलियन ने उन सत्तर जंगली बिल्लियों को देखा, उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। उसके सेनापतियों को समझ में नहीं आ सका क्या हो गया है। वह कोई महान योद्धा नहीं रह गया था, वह लगभग भय से जम गया था, कांप रहा था। उसने कभी किसी सेनापति को सेना की व्यवस्था करने की अनुमति नहीं दी थी, लेकिन आज उसने आंखों में आंसू लेकर कहा, "मैं सोचने के काबिल नहीं हूं -- तुम सेना की व्यवस्था करो, मैं यहां हूं, लेकिन मैं लड़ने के काबिल नहीं हूं। मेरे साथ कुछ गलत हो गया है"।

वह हटा दिया गया था, लेकिन नेपोलियन के बिना उसकी सेना नेल्सन से लड़ने में सक्षम नहीं थी, और नेपोलियन की स्थिति देखते हुए, उसकी सेना में सब लोग थोड़ा डर गए थे: कुछ बहुत ही अजीब हो रहा था।

बच्चा कमजोर है, संवेदनशील, असुरक्षित है। स्वायत्तता से वह एक कवच बनाना शुरू करता है, एक सुरक्षा, अलग-अलग तरीकों से। उदाहरण के लिए, उसे अकेले सोना होता है। अंधेरा है और वह भयभीत है, लेकिन उसके साथ उसका भालू का खिलौना, टेडी बेयर है, और वह मानता है कि वह अकेला नहीं है, उसका दोस्त उसके साथ है। आप बच्चों को हवाई अड्डों पर, रेलवे स्टेशनों पर अपने टेडी बेयर को खींचते देखेंगे। क्या आपको लगता है कि यह सिर्फ एक खिलौना भर है? तुम्हारे लिए यह होगा, लेकिन बच्चे के लिये एक दोस्त है। और दोस्त भी उस वक्त जब कोई मददगार नहीं है -- रात के अंधेरे में, अकेले बिस्तर में, अभी भी वह उसके साथ है। वह मनोवैज्ञानिक टेडी बेयर पैदा करेगा।

तुम्हें मैं याद दिलाना चाहता हूं कि हालांकि एक वयस्क आदमी सोच सकता है कि उसके पास कोई टेडी बेयर नहीं है, वह गलत है। उसका भगवान क्या है? बस एक खिलौना। अपने बचपन के डर से, आदमी एक पिता तुल्य हस्ती बना लेता है जो सब जानता है, जो सर्व शक्तिमान है, जो हर जगह मौजूद है, अगर तुम्हें उसमें पर्याप्त विश्वास है वह तुम्हारी रक्षा करेगा। लेकिन सुरक्षा का विचार, यह विचार मात्र कि एक रक्षक की जरूरत है, बचकाना है। तो फिर तुम प्रार्थना सीखते हो, ये तो बस तुम्हारे मनोवैज्ञानिक रक्षा कवच के कुछ हिस्से हैं। प्रार्थना भगवान को याद दिलाने के लिए है कि तुम यहां हो, रात में अकेले।

मेरे बचपन में मैं हमेशा अचम्भित होता था... मैं नदी को प्यार करता था, जो कि पास में थी, मेरे घर से सिर्फ दो मिनट पैदल की दूरी पर। सैकड़ों लोगों स्नान करने के लिए वहां आया करते थे और मैं हमेशा अचम्भित होता था...गर्मियों में जब वे नदी में गोता लगाते हैं वे भगवान का नाम नहीं दोहराते, वे मनोवैज्ञानिक टेडी बेयर पैदा करेंगे "हरे कृष्ण, हरे राम”! वे मनोवैज्ञानिक टेडी बेयर पैदा करेंगे लेकिन सर्दियों में वे दोहराते हैं, “हरे कृष्ण, हरे राम”। वे "हरे कृष्ण, हरे राम” दोहराते हुए जल्दी से स्नान करते हैं।

मैं अचम्भित हो रहा था, क्या मौसम से फर्क पड़ता है? मैं अपने माता पिता से पूछता था, "यदि 'हरे कृष्ण, हरे राम’ के भक्त हैं, तब गर्मी उतनी ही अच्छी है जितनी कि सर्दी”।

लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह ईश्वर या प्रार्थना या धर्म है, यह सिर्फ ठंड है! वे 'हरे कृष्ण, हरे राम" का कवच बना रहे हैं। वे अपना बहलाव कर रहे हैं। यहां बहुत ठंड है, और एक मोड़ की जरूरत है -- और यह मदद करता है। गर्मियों में वहां कोई जरूरत नहीं है, वे बस भूल जाते हैं कि पूरी सर्दियों वे सब क्या कर रहे थे।

हमारी प्रार्थनायें, हमारे अलाप, हमारे मंत्र, हमारे शास्त्र, हमारे देवता, हमारे पुजारी, हमारे मनोवैज्ञानिक कवच का हिस्सा हैं। यह बहुत सूक्ष्म है। एक ईसाई का विश्वास है कि वह बच जाएगा -- और कोई नहीं। अब यह उसकी रक्षा व्यवस्था है। हर कोई उसे छोड़कर नरक में गिर रहा है, क्योंकि वह एक ईसाई है। लेकिन हर धर्म एक ही रास्ते में विश्वास करता है कि केवल वे ही बचे रहेंगे।

यह धर्म का सवाल नहीं है। यह भय का सवाल है और भय से बचने के लिये किया जा रहा है, तो यह एक तरह से प्राकृतिक है। लेकिन तुम्हारी परिपक्वता के एक निश्चित बिंदु पर, ज्ञान की मांग है कि उसे गिरा दिया जाये। जब तुम एक बच्चे थे यह अच्छा था, लेकिन एक दिन तुम्हें अपने टेडी बेयर को छोड़ना है वैसे ही जैसे एक दिन तुम अपने ईश्वर को छोड़ना है, बस उसी तरह एक दिन तुमने ईसाई धर्म, हिन्दू धर्म को छोड़ दिया है। अंत में, जिस दिन तुमने सब कवच छोड़ दिये तुमने भय से रहना छोड़ दिया।

और किस तरह जीना डर से बाहर हो सकता है? एक बार कवच छोड़ दिये तो तुम प्यार के धरातल पर रह सकते हो, तुम एक परिपक्व तरीके से रह सकते हो। पूरी तरह परिपक्व आदमी को कोई डर नहीं होता, कोई बचाव नही है, वह मानसिक रुप से पूरी तरह से खुला है और सुभेद्य है।

एक बिंदु पर कवच की आवश्यकता हो सकती है... शायद है भी। लेकिन जैसे ही तुम विकसित होते हो, यदि तुम केवल बूढ़े नहीं हो रहे हो लेकिन बड़े हो रहे हो, परिपक्व हो रहे हो, तब तुम देखना शुरू कर दोगे कि तुम अपने साथ क्या ले जा रहे हो। क्यों तुम भगवान में विश्वास करते हो? एक दिन तुम स्वयं भी देखोगे कि तुमने भगवान को नहीं देखा है, तुम्हारे पास भगवान का कोई संपर्क नहीं था, और भगवान में विश्वास करते रहना एक झूठ है: तुम ईमानदार नहीं हो ।

किस तरह का धर्म होगा जब कोई ईमानदारी, प्रामाणिकता नहीं है? तुम तुम्हारे विश्वासों के लिए कोई कारणा भी नहीं दे सकते, और अभी भी तुम उन्हें पकड़कर चलते हो।

बारीकी से देखो और तुम्हें उनके पीछे भय मिल जाएगा।

एक परिपक्व व्यक्ति खुद को जो कुछ भी भय के साथ जुड़ा हुआ है उससे अलग कर सकता है। इसी तरह परिपक्वता आती है।

बस अपने सभी कृत्यों, अपने सभी विश्वासों को देखो और पता लगाओ कि उनके आधार वास्तविकता में हैं, अनुभव में, या भय में हैं। और जिसका भी आधार भय में होता है उसे तुरंत गिरा दिया जाये, बिना पुनर्विचार के। यह तुम्हारा कवच है। मैं इसे नहीं पिघला सकता। मैं बस तुम्हें दिखा सकता हूं कि कैसे तुम इसे छोड़ सकते हो।

हम भय में जीए जाते हैं -- यही कारण है कि हम हर दूसरा अनुभव जहरीला करते चले जा रहे हैं। हम किसी को प्यार करते हैं, लेकिन डर के मारे। यह खराब कर देता है, यह जहरीला है। हमें सच की तलाश है, लेकिन अगर खोज डर से है तो तुम इसे खोजने नहीं जा रहे हैं।

तुम जो भी करो, एक बात स्मरण रहे, भय से तुम विकसित नहीं होओगे। तुम केवल सिकुड़ जाओगे और मर जाओगे। भय मौत की सेवा में होता है।

महावीर सही हैं: वह निडरता को एक निडर व्यक्ति की बुनियाद बनाते हैं। और मैं समझ सकता हूं निडरता से उनका क्या मतलब है। उनका मतलब सब कवच को छोड़ना है। एक निडर व्यक्ति के पास वह सब कुछ है जो जीवन तुम्हें उपहार के रूप में देना चाहता है। अब कोई बाधा नहीं है। तुम पर उपहारों की बौछार होगी, और तुम जो भी करोगे, तुम्हारे पास एक बल, एक शक्ति, एक निश्चितता होगी, अधिकार का एक जबरदस्त अहसास होगा।

एक भयभीत रहने वाला आदमी हमेशा भीतर से कांप रहा हैं। वह निरंतर पागल हो जाने के बिंदु पर है, क्योंकि जीवन बड़ा है, और यदि तुम निरंतर भय में हो... और भय के कई प्रकार हैं। तुम एक बड़ी सूची बना सकते हो और तुम हैरान होंगे कि कितने भय हैं - और तुम अभी भी जीवित हो! वहां सभी तरफ संक्रमण हैं, रोग, खतरे, अपहरण, आतंकवादी …और इतनी छोटी सी जिंदगी। और अंत में मौत है, जिससे तुम बच नहीं सकते। तुम्हारा पूरा जीवन अंधकारमय हो जाएगा।

भय छोड़ो! भय तुम्हारे द्वारा लिया गया था तुम्हारे बचपन में, अनजाने में, अब जानते हुए इसे छोड़ दो और परिपक्व हो जाओ। और तब जैसे-जैसे तुम विकसित होते जाते हो, जिंदगी एक प्रकाश हो सकता है जो गहराता जाता है। -ओशो 

Monday, April 4, 2011

जब हनीमून समाप्त हो जाता है तो इसके बाद क्या ........?????????








जब हनीमून का जादू क्षीण हो जाता है तो आपके क्या विकल्प होते हैं? आप आग को पुनः प्रज्वलित कर सकते हैं, आप कोई नया साथी खोज सकते हैं और दूसरा हनीमून मना सकते हैं, या आप ऊर्जा को कुछ ज्यादा ताजगी से और ज्यादा गहराई के साथ रूपांतरित कर सकते हैं।

प्रेम एक गुलाब का फूल है। सुबह यह हवा में, धूप में झूमता रहता है और लगता है कि इसी मस्ती के साथ, ऐसी ही निश्चितता के साथ, इसी अधिकार के साथ यह सदैव बना रहेगा। यह इतना कोमल और फिर भी इतना मजबूत होता है कि हवा बहे, वर्षा हो, धूप हो, उसमें भी खिला रहता है, लेकिन सायंकाल तक इसकी पंखुड़ियां बिखर जाती हैं और गुलाब समाप्त हो जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि यह एक भ्रांति थी। इसका साधारण सा मतलब यही है कि जीवन में हर वस्तु बदलती रहती है। और परिवर्तन हर चीज को नया और ताजा कर देता है।

जिस दिन विवाह समाप्त हो जाएगा पुरुष और स्त्री का जीवन स्वस्थ हो जाएगा, निश्चित रूप से तुम्हारी कल्पना से भी अधिक लंबा रहेगा। विवाह जीवन की बदलती हुई प्रकृति के विरोध में है, यह स्थायी का सृजन करता है। पति और पत्नी दोनों सुस्त और ऊबे हुए रहते हैं--जीवन में रस खो जाता है। निश्चित ही उन्हें अपना रस नष्ट करना ही होता है अन्यथा विवाद निरंतर बना रहता है। पति किसी दूसरी औरत में कोई रुचि नहीं ले सकता, पत्नी दूसरे पुरुष के साथ नहीं हंस सकती। वे एक-दूसरे के कैदी हो जाते हैं। जीवन बोझ बन जाता है और यह एक दिनचर्या बन जाती है।

ऐसा जीवन कौन जीना चाहता है? जीने की इच्छा क्षीण हो जाती है। इससे रुग्णता और बीमारियां पैदा हो जाती हैं क्योंकि मृत्यु के प्रति उनकी कोई प्रतिरोधिता नहीं होती। वास्तव में वे यह सोचने लगते हैं के इस सारे कुचक्र को शी्घ्र ही जैसे भी हो समाप्त किया जाए। भीतर ही भीतर वे मृत्यु की इच्छा करने लगते हैं। उनकी मरने की इच्छा जाग"त हो जाती है।

सिगमंड फ्रायड पहला व्यक्ति था जिसने यह पता लगाया कि मनुष्य के अचेतन मन में मृत्यु की इच्छा विद्यमान होती है। किंतु फ्रायड के साथ मैं सहमत नहीं हूं। मृत्यु की यह इच्छा कोई सहज प्रवृत्ति नहीं है। यह विवाह की देन है, यह एक उबाऊ जीवन की देन है। जब व्यक्ति यह अनुभव करने लगता है कि जीने में अब कोई रोमांच नहीं है। कोई नई जगह, कोई नया ठिकाना नहीं मिलता, तो अनावश्यक रूप से जीते रहने का क्या लाभ है? तब तो कब्र में शाश्वत नींद ही ज्यादा आरामदायक लगती है, जो ज्यादा सुविधाजनक और कहीं ज्यादा आनंददायक होती है।

किसी भी पशु में मृत्यु की इच्छा विद्यमान नहीं होती। जंगल में कोई भी पशु आत्महत्या नहीं करता। किंतु आश्चर्य यह है कि चिड़ियाघर में पशु भी आत्महत्या करते हुए पाए गए। और विवाह प्रत्येक व्यक्ति को चिड़ियाघर का एक पशु बना देता है--परिष्कृत, हजारों सूक्ष्म तरीकों से जंजीरों में जकड़ा हुआ होता है। सिगमंड फ्रायड को जंगली जानवरों या असभ्य मनुष्यों का पता नहीं था।

मैं चाहता हूं कि मनुष्य में कुछ जंगलीपन शेष रहे। यह मेरा विद्रोह है। उसे चिड़ियाघर का हिस्सा नहीं बनना है, वह तो स्वाभाविक ही बना रहेगा। वह जीवन के विरोध में नहीं जाएगा, वह तो जीवन के साथ बहेगा। यदि पुरुष और स्त्री समझौता कर सकते हैं कि हमें चिडियाघर का हिस्सा नहीं बनना है, जो बिलकुल भी कठिन नहीं है, जो सबसे सरल है, तो हमें चिड़ियाघर से मुक्ति मिल सकती है। इसी बात की जरूरत है--विवाह से मुक्ति।

यदि स्त्री अपन स्वाभाविक जंगलीपन में बड़ी होती है और पुरुष अपने सहज जंगलीपन में बड़ा होता है, और अजनबी की तरह वे मैत्री भाव से मिलते हैं, तो उनके प्रेम में असीम गहराई होगी, अत्याधिक आनंद और सुखद नृत्य होगा।

इसमें कोई करार नहीं होता, इसमें कोई कानून नहीं होता-- प्रेम स्वयं में एक कानून है--और जब प्रेम समाप्त हो जाता है वे एक-दूसरे को कृतज्ञता के साथ अलविदा कहेंगे, जो सुंदर क्षण उन्होंने एक साथ व्यतीत किए हैं, वे गीत जो उन्होंने एक साथ गाए हैं, वे नृत्य जो उन्होंने पूर्णिमा के दिन किया था, समुद्र तट पर उन संगीतमय क्षणों के लिए कृतज्ञता के साथ। वे उद्यान की उन मधुर स्मृतियों को अपने साथ संजोए हुए रखेंगे, और वे हमेशा-हमेशा के लिए कृतज्ञ रहेंगे। किंतु वे एक-दूसरे की स्वतंत्रता में बाधक नहीं बनेंगे, उनका प्रेम इसे रोकता है। उनके प्रेम को अधिक स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। अतीत में यह अधिक से अधिक दासता देता आया है।
                                                                    -ओशो






Friday, March 11, 2011

न्याय की देवी


तुम बैठती क्यों नहीं हो न्याय की देवी!
मैं देख रहा हूँ तुम्हारे हाथ में थमा हुआ तराजू
तुम्हें पीड़ा पहुँचा रहा है
तुम्हारे चेहरे पर स्पष्ट झलकती है थकन
फिर भी तुम बैठना क्यों नहीं चाहती
आखिर क्या विवशता है

इस देश का हर संवेदनशील आदमी
यहाँ रहते हुए शर्मिंदा होने को विवश है
आखिर तुम क्यों नहीं शर्मिदा हो पा रही हो

माना कि तुम्हारी आँख पर बाँध दी गई है पट्टी
लेकिन तुम्हारे कान तो खुले हुए हैं
जिनमें हत्या, बलात्कार और आगजनी से पीड़ितों की चीखें
कराहें और सिसकियाँ तो पड़ती होंगी
याकि तुम भी यह मान चुकी हो कि यह सब होने के लिए है

न्याय की देवी!
गाँधारी ने भी बाँध ली थी पट्टी
अंधे पति की विवशता से घबराकर
या अपने पुत्रों के अन्याय से आँख बचाने हेतु
जिन पर इतनी ममता थी गाँधारी को
कि अन्याय के प्रतीक पुत्र को वज्र-सी काया दे दी


लोग तुम्हें एक औरत की तरह संवेदनशील मानते हैं
और तुम मुट्ठी भर लोगों के हाथ का खिलौना हो
यह किसकी त्रासदी है

इस सदी के बीतने से पहले ही ओरत ने
अपनी मुक्‌ति की घोषणा कर दी है
वह उन विशेषणों को नोच कर फेंक रही है
जो उसके स्त्रीपन को हरने के औजार थे
उसने यह सच मान लिया
कि सृजन से पहले
अभी बहुत कुछ ध्वस्त करना ज़रूरी है
लेकिन तुम इतनी जड़ हो चुकी हो कि अपनी आँख की
पट्टी तक खोलने को अशक्त हो

क्या तुम देखना नहीं चाहती हो न्याय की देवी!
कि न्यायमूर्ति से लेकर सिपाही तक
हर तरह का जरायमपेशा फ़र्ज़ के नाम पर करते जा रहे हैं
वे जनाते हैं कि कौन डाकू है
किसने किया बलात्कार और कौन जेब काट रहा है सरेआम
वे सबकुछ देख रहे हैं
कौन किसकी हत्या कर रहा है
और कौन रास्ता बताने के नाम पर आँखों में धूल झोंक रहा है
तुम्हारी तरह उनकी आँखों पर पट्टी नहीं बँधी है
बल्कि कइयों ने पावर के चश्मे तक लगा रखे हैं
फिर भी वे तुम्हारे अंधेपन का सहारा लेकर
सबूत जुटाने का ढोंग कर रहे हैं

क्या मतलब है!
उनके सबकुछ जानते हुए अनजान बने रहने का
और तुम्हारा आँख पर पट्टी बाँधे खड़ी रहने का

वे भी सबकुछ जानते थे
जिन्होंने यह संविधान बनाया जिसकी ओट में तुम खड़ी हो
कि अस्सी फ़ीसदी हिन्दुस्तान बड़ा गरीब देश है
और उसके पास रोटी, रोशनी और रिहायश नहीं है
जिसे पाने में बीस फ़ीसदी हिन्दुस्तान बाधा की तरह
खड़ा रहेगा उसके सामने
अब न्याय और आदमियत का यही तकाज़ा है कि
बीस हिन्दुस्तान का अस्तित्व मिटा दिया जाय
निकाल दिया जाय जैसे कैंसरग्रस्त हिस्सों को निकाला जाता है शरीर से
ताकि एक पूरा हिन्दुस्तान बन सके

लेकिन उन्होंने अस्सी फ़ीसदी हिन्दुस्तान को
कुत्ता बनाकर रखने के कायदे रचे
ऐसे बंदोबस्त किए कि अस्सी फीसदी हिन्दुस्तान
की रीढ़ दुहरी रहे हमेशा
और बीस फ़ीसदी की ख़ुशहाली के पौधे लगाये उन्होंने
उन्होंने बीस फीसदी लोगों को अधिकार दिया कि वे
अस्सी फ़ीसदी हिन्दुस्तान पर गोलियाँ चला सकते हैं
उन्होंने ही तुम्हारी आँख पर पट्टी बाँधकर
बीस फ़ीसदी हिन्दुस्तान की सेवा में सौंप दिया था

न्याय की देवी!
स्त्रियाँ अब जाग रही हैं
मुक्ति के गीतों में सुरे-बेसुरे ढंग से शामिल हो रही हैं वें
जान गई हैं वें कि
सृजन से पहले बहुत कुछ ध्वस्त करना है ज़रूरी
कि सुरों की तराश से ज्यादा ज़रूरी है गले की ताक़त
दिलों का दर्द, नारों की समझ
और उठने, चलने की बेचैनी
तब तुम्हारी ओर निगाहें उठना स्वभाविक है

न्याय की देवी!
कुछ कहना पड़ेगा तुम्हें अब
वरना दो स्तनों और एक योनि लेकर पैदा हुई
जीवन भर लुटेरों और आदमखोरों के हाथों प्रताड़ित
स्त्री के नाम पर कलंक मानी जाओगी तुम।

Tuesday, March 8, 2011

हिंसा से मुक्ति के लिए हिंसा का दर्शन अनिवार्य है.....................................

 तुम्हारे उत्तर प्रश्नों के घेरे में....

  
मैंने निश्चित ही कहा है कि हिंसा आत्म-अज्ञान से पैदा होती है। और इन दोनों बातों में कोई विरोध नहीं है। आत्म-अज्ञान भी हमारा चुनाव है, हिंसा भी हमारा चुनाव है। हम होना चाहें अहिंसक, तो अब कोई हमें रोक नहीं सकता। मनुष्य जो भी होना चाहे, हो सकता है। मनुष्य का विचार ही उसका व्यक्तित्व है; उसका निर्णय ही, उसकी नियति है; उसकी आकांक्षा ही, उसकी अभीप्सा ही, उसका आत्मसृजन है।
इसलिए अब कोई आदमी अपने मन में यह कभी भूल कर भी न सोचे कि वह जो है, उसमें वह क्या कर सकता है? क्रोध है, तो क्या कर सकता है? हिंसा है, तो क्या कर सकता है? अज्ञान है, तो क्या कर सकता है? आदमी को यह कहने का हक नहीं है। जैसे ही आदमी कहता है कि मैं क्या कर सकता हूं, वह यह खबर दे रहा है कि कर सकता है, और अपने को समझाने की कोशिश कर रहा है कि क्या कर सकता हूं! कोई पशु नहीं कहता कि मैं क्या कर सकता हूं? यह सवाल ही नहीं है।
आदमी जिस दिन कहता है, मजबूरी है, मैं क्या कर सकता हूं? हिंसक मुझे होना ही पड़ेगा! उस दिन वह यह कह रहा है कि मैं चुन भी रहा हूं और चुनाव की जिम्मेवारी भी छोड़ रहा हूं। मैं हिंसक हो भी रहा हूं और हिंसक होने का दोष किसी और के कंधों पर--प्रकृति के, परमात्मा के कंधों पर छोड़ रहा हूं।

जिस आदमी ने अपनी आदमियत का बोझ किसी और पर छोड़ा, वह पशुता की दुनिया में वापस गिर जाता है। असल में वह आदमी होने से इनकार कर रहा है। जो आदमी चुनने से इनकार कर रहा है, वह आदमी होने से इनकार कर रहा है। वह यह कह रहा है कि नहीं, हम पशु बेहतर--जहां न कोई चुनाव है, न कोई जिम्मेवारी है, न कोई निर्णय है, न कोई परेशानी है। जो है, वह है। हम वापस लौटते हैं।
शराब पीकर आदमी पशु में वापस लौट जाता है। हिंसा करके आदमी पशु में वापस लौट जाता है। क्रोध करके आदमी पशु में वापस लौट जाता है।
इसलिए क्रोध से भरे व्यक्ति को अगर देखें तो उसमें सिर्फ आदमियत की रूपरेखा भर दिखाई पड़ती है, आत्मा दिखाई नहीं पड़ती। हिंसा से भरी हुई आंखें देखें, तो उसमें आदमी की आंखें नहीं दिखाई पड़तीं, तत्काल आंखों में एक मेटामार्फोसिस हो जाती है। आंखें बदल जाती हैं। भीतर से कोई छिपा हुआ पशु तत्काल प्रगट हो जाता है। इसलिए क्रोध में, हिंसा में आदमी पशु जैसा व्यवहार करता है; काटता है, चीखता है, नोचता है।
आदमी के नाखून छोटे पड़ गए हैं, क्योंकि उनकी बहुत जरूरत नहीं रह गई है। जंगली जानवर के पास नाखून हैं, जो आपकी हड्डियों तक के मांस को बाहर खींच लायें। लाखों वर्षों से आदमी को अब किसी की हड्डियों तक के मांस को खींचने की जरूरत नहीं रह गई, तो नाखून छोटे हो गए हैं। तो फिर आदमी को छुरी, भाले, बर्छियां बनानी पड़ी हैं। वे सब्स्टीटयूट हैं, जिनसे वह जानवर का काम ले लेता है। क्योंकि नाखून उसके पास छोटे पड़ गये हैं। दांत उसके अब ऐसे नहीं रहे कि वे किसी के मांस को काटकर बाहर निकाल लें, तो उसने हथियार, औजार बनाए; गोलियां बनाई हैं जो आदमी की छाती में धंस जायें।
आदमी ने जितने अस्त्र-शस्त्र खोजे हैं, वह अपनी खो गई पशुता को सब्स्टीटयूट करने के लिए, परिपूरक करने के लिए खोजे हैं। जो जानवरों के पास है वह हमारे पास नहीं है, तो हमें बनाना पड़ा है।
निश्चित ही, जब हमने बनाया है तो जानवरों से बेहतर बना लिया है।
किस जानवर के पास एटम-बम है? किस जानवर के पास सैकड़ों मील दूर बम फेंकने के उपाय हैं? नहीं, जानवर के पास बड़े प्रकृति-प्रदत्त साधन हैं। और आदमी ने अपनी सारी बुद्धिमत्ता का उपयोग करके--करोड़ों जानवरों को इकट्ठा करके भी जो न हो सके, वह एक आदमी कर सकता है। यह आदमी का अपना चुनाव है।
जिस दिन किसी आदमी को यह बात स्पष्ट दिखाई पड़ जाती है कि जो भी मैं हूं, उसकी जिम्मेवारी मेरी है, उसी दिन से परिवर्तन और रूपांतरण शुरू हो जाता है। जिस आदमी की जिंदगी में अभी यह खयाल है कि जो मैं हूं, हूं; उसमें मेरा कोई वश नहीं, उस आदमी की जिंदगी में धर्म के मंदिर का द्वार कभी भी नहीं खुल सकता।
उत्तरदायित्व मेरा है, और मैं ही निर्णायक हूं अपनी नियति का, इस बात का बोध मनुष्य की जिंदगी को परिवर्तित करता है।
इसलिए मैंने कहा कि आत्म-अज्ञान के लिए मनुष्य स्वयं जिम्मेवार है। जिम्मेवार इन अर्थों में कि वह तोड़ सकता है, और नहीं तोड़ रहा है; मिटा सकता है, और नहीं मिटा रहा है; मुक्त हो सकता है, और नहीं मुक्त हो रहा है।
आचार्य श्री, कृपया समझाएं कि ध्यान-साधना में हिंसक-वृत्तियों का विसर्जन और उदात्तीकरण अर्थात डिजोल्यूशन और सब्लीमेशन किस प्रकार घटित होता है?

हिंसा की वृत्ति अकेली वृत्ति ही नहीं है, हिंसा की वृत्ति के साथ हिंसा के अनेक वेगों का दमन भी संयुक्त है, सप्रेशन भी संयुक्त है। हिंसा की वृत्ति तो है ही, हिंसा करने की आकांक्षा भी है। लेकिन हजार मौकों पर हिंसा करने का उपाय नहीं होता है। हिंसा करना चाहते हैं और नहीं कर पाते हैं। क्योंकि संस्कृति है, सभ्यता है, जीवन की व्यवस्था है, परिस्थितियां हैं, प्रतिकूलताएं हैं। ऐसा आदमी खोजना मुश्किल है, जिसने किसी क्षण में किसी दूसरे को मार डालने का विचार न किया हो! ऐसा आदमी भी खोजना मुश्किल है, जिसने किसी क्षण में अपने को ही मार डालने का विचार न किया हो! दिन में न किया होगा, तो रात सपने में किया होगा। लेकिन सभी आदमी दूसरों को मार नहीं डालते, और सभी आदमी आत्महत्याएं नहीं कर लेते। सोचते हैं, प्रतिकूलताएं हैं...संभव नहीं हो पाता।
और जब एक बार हिंसा का भाव मन में उठ जाये और प्रगट न हो पाए, तो हिंसा की वृत्ति तो रहती ही है, हिंसा के भाव का वेग भी दमित हो जाता है। यह भी इकट्ठा होने लगता है। हिंसा की वृत्ति तो भीतर बनी ही रहती है, और न की गई हिंसा की, की गई भावनाएं भी संग्रहीत होती चली जाती हैं। एक जन्म की नहीं, अनेक जन्मों की भी इकट्ठी हो जाती हैं। उस संग्रह को भी हम अपने साथ लेकर चल रहे हैं। वृत्ति तो साथ है ही, दबाए हुए वेग भी साथ हैं। इधर वृत्ति रोज नये वेग पैदा करती है और उधर पुराने वेगों का संग्रह बढ़ता चला जाता है। और किसी भी क्षण विस्फोट हो सकता है।
इसलिए हिंसा की वृत्ति से जो मुक्ति है, उस मुक्ति के लिए दो बातें समझ लेनी जरूरी है: हिंसा की वृत्ति का तो विसर्जन होना ही चाहिए, हिंसा के दबे हुए, दबाए गए वेगों का विसर्जन भी जरूरी है। हिंसा की वृत्ति मिटेगी, तो मैं आने वाले भविष्य में हिंसा के वेगों को पैदा नहीं करूंगा, लेकिन मैंने जो अतीत में वेग दबाये हैं, उनका विसर्जन, उनका रेचन, उनकी कैथार्सिस भी होनी जरूरी है।
महावीर ने बहुत सुंदर शब्द कैथार्सिस के लिए प्रयोग किया है। पश्चिम में मनसशास्त्री जिसे कैथार्सिस कहते हैं, रेचन कहते हैं, महावीर ने उसे "निर्जरा' कहा है। वह बहुत अदभुत शब्द है।
निर्जरा का अर्थ है, विदरिंग अवे। निर्जरा का अर्थ है, किसी चीज का झड़ जाना। कोई चीज जो इकट्ठी है, उसका बिखर जाना। निर्जरा का अर्थ है, अगर ऊपर धूल इकट्ठी हो गई है, तो धूल के कणों को फेंककर अलग कर देना।
बहुत वेग हमारे भीतर इकट्ठे हैं। ध्यान में इनकी निर्जरा, इनकी कैथार्सिस की जा सकती है; और सिर्फ ध्यान में ही की जा सकती है। और कोई उपाय मनुष्य के दबे हुए वेगों की निर्जरा का नहीं है।
ध्यान में कैसे की जा सकती है?
जब आपके मन में किसी को घूंसा मारने की इच्छा पैदा होती है, तब आप एक छोटा सा प्रयोग करके देखेंगे और बहुत हैरान होंगे और यह प्रयोग मैं मजाक में नहीं कह रहा हूं। अमेरिका में एक बड़ी वैज्ञानिक प्रयोगशाला इस प्रयोग को आज कर रही है।
केलिफोर्निया में एक संस्था है, इसालेन इंस्टीटयूट। शायद अमेरिका में एक बहुत कीमती ऋषि आज मौजूद है। उसका नाम है, पर्ल्स। वह जिन लोगों के मन में बड़ी हिंसा है, उनकी आंखों पर पट्टियां बंधवा देता है, तकिए उनके सामने रख देता है, और कहता है, मारो घूंसे और समझो कि दुश्मन सामने है। जिसे तुम्हें मारना है, उसी को मारो!
पहले तो आदमी हंसता है कि तकिए को कैसे मारें! लेकिन किसी दूसरे आदमी को मारने में और तकिए को मारने में हाथ को कोई भी फर्क नहीं पड़ता है। और किसी आदमी को मारने में और किसी तकिए को मारने में, खून में जो विष पैदा हो गया है, उसके निकलने में भी कोई फर्क नहीं पड़ता है। दूसरा आदमी भी तकिए से ज्यादा और क्या है?
तो पर्ल्स अपने हिंसक मरीज को कहेगा कि मारो तकिए को!
पहले मरीज हंसेगा, लेकिन पर्ल्स कहेगा, हंसो मत, मारो! मरीज कहेगा, आप भी क्या मजाक करते हैं! लेकिन पर्ल्स कहेगा, थोड़ा मजाक ही सही, लेकिन मारो! मरीज तकिए को मारना शुरू करेगा और थोड़ी ही देर में आस-पास खड़े लोग देखकर हैरान होंगे कि न केवल मारने में उसकी गति आ गई, न केवल वह तकिए से जूझने लगा, न केवल तकिए से वह दुश्मनी निकाल रहा है, बल्कि वह तकिए को चीरेगा, फाड़ेगा, मुंह से काट डालेगा; तकिए के टुकड़े-टुकड़े कर देगा! और जिन लोगों को भी इन प्रयोगों से गुजरना पड़ा है, वे प्रयोग के बाद कहते हैं कि मन बहुत हल्का हो गया है। इतना हल्का कभी भी नहीं था।
ये पर्ल्स क्या कह रहा है? ये यह कह रहा है कि तुमने अब तक हिंसा सकारण निकाली है, किसी पर निकाली है। अब तुम हवा में निकाल लो, किसी पर मत निकालो; क्योंकि जब भी किसी पर निकाली जायेगी, तो उसकी प्रतिक्रियाएं होंगी।
अगर मैं किसी को घूंसा मारूंगा, तो यह घूंसा आकाश में खो नहीं जायेगा, अंतरिक्ष इसको एबजार्ब नहीं कर लेगा। जिसको घूंसा मारूंगा, वह इसका उत्तर देगा। आज देगा, कल देगा, परसों देगा--प्रतीक्षा करेगा, लेकिन उत्तर देगा। और जब मैं किसी को घूंसा मारूंगा, तो हो सकता है वह बुद्ध जैसा, महावीर जैसा कोई आदमी हो, और उत्तर न भी दे, तो भी जैसे ही मैं किसी को घूंसा मारूंगा, तो मेरे मन में भी प्रतिक्रिया और पश्चाताप होगा।
और ध्यान रहे! क्रोध ही बुरा नहीं है, पश्चात्ताप भी उतना ही बुरा है। क्योंकि पश्चात्ताप उल्टा हो गया क्रोध है, पश्चात्ताप शीर्षासन करता हुआ क्रोध है। पश्चात्ताप भी उतना ही बुरा है। असल में पश्चात्ताप करके आदमी फिर से क्रोध करने की तैयारी के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं करता है। जब एक आदमी रिपेंट करता है और कहता है, बहुत बुरा हुआ कि मैंने क्रोध किया, तब वह अपने मन को यह समझा रहा है कि मैं इतना बुरा आदमी नहीं हूं, एक बुरा काम हो गया है, यह दूसरी बात है।
पश्चात्ताप करके वह अपने अच्छे आदमी को वापस पुनर्स्थापित कर रहा है। वह रीइस्टेबलिश कर रहा है अपनी पुरानी इज्जत को, अपनी ही आंखों में। और जैसे ही वह पुनर्स्थापित हो जायेगा, कल फिर घूंसा मारने के लिए तैयार हो जायेगा। परसों फिर पश्चात्ताप, फिर घूंसा। क्रोध और पश्चात्ताप का एक दुष्ट-चक्र घूमता रहेगा।
और जब हम किसी व्यक्ति को घूंसा मारते हैं, तो न केवल पश्चात्ताप होता है, बल्कि वह घूंसे का उत्तर देगा, इसकी पुनः तैयारी भी शुरू हो जाती है। इसलिए हिंसा फिर एक दुष्ट-चक्र बन जाती है, जिसके बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।
लेकिन तकिए को अगर एक आदमी घूंसा मार रहा है, तो ऐसा कुछ भी नहीं घटता। तकिए को घूंसा मारने में निर्जरा हो रही है। पर्ल्स तकिए को घूंसा मारने को कह रहा है, क्योंकि जिस दुनिया में हम रह रहे हैं, वह बहुत आब्जेक्टिव हो गई है। महावीर पच्चीस सौ साल पहले थे। वे कहते, हवा में ही घूंसा मार दो, तकिए की क्या जरूरत है? लेकिन हम कहेंगे, हवा में घूंसा? तकिए को तो फिर भी मारने जैसा लगता है। वह कम से कम आदमी की पीठ जैसा लगता है, पेट जैसा लगता है! तकिए को घूंसा छुयेगा तो ऐसा ही लगेगा कि किसी को छुआ, थोड़ा-सा तो तकिया भी उत्तर देगा।
दुनिया पच्चीस सौ साल में महावीर के बाद वस्तुगत हो गई है। महावीर ने जिस ध्यान की बात की है, उस ध्यान में तकिए की भी कोई जरूरत नहीं है। मैं भी जिस ध्यान की बात करता हूं, उसमें भी तकिए की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन शायद अमेरिका में तकिए के बिना घूंसा मारना और भी मुश्किल हो जायेगा। वस्तुगत कुछ तो होना ही चाहिए। आदमी न सही, तो तकिया ही सही।
महावीर तो तकिए को भी मारने को मना करेंगे। वे तो कहेंगे...पर्ल्स को वे तो कहेंगे, इसमें भी थोड़ी-सी हिंसा हो रही है। यह आदमी तकिए में अपने दुश्मन को प्रोजेक्ट कर रहा है। कोई दुश्मन नहीं है, जिसको चोट पहुंच रही है, लेकिन इस आदमी को किसी को मारने का मजा और रस आ रहा है। यह रस भी हिंसा की धारा को थोड़ा-बहुत जारी रखेगा। इससे हिंसा की पूर्ण निर्जरा नहीं हो जायेगी।
इसलिए पर्ल्स की लेबोरेटरी से गए लोग दो-चार-छह महीने बाद फिर वापस आ जाएंगे और कहेंगे कि हिंसा फिर मन में इकट्ठी हो गई। अब फिर उनको तकिया चाहिए और फिर उनको मारना पड़ेगा।
ध्यान की प्रक्रिया कहती है कि आप किसी की फिक्र छोड़ दें, सब्जेक्टिव वायलेंस कर लें। सब्जेक्टिव वायलेंस का मतलब अपने साथ हिंसा करना नहीं है। सब्जेक्टिव वायलेंस का मतलब है, सिर्फ हिंसा को हो जाने दें--बिना किसी आब्जेक्ट के, बिना किसी विषय के, बिना किसी वस्तु के।
एक आदमी अगर ध्यान में चीख मारकर चिल्लाये, घूंसे मारे, नाचे, कूदे, तो उसके भीतर जो हिंसा के दबे हुए वेग हैं, उनकी निर्जरा होती है। वे गिर जाते हैं। एक घंटे भर के किसी भी दिन के प्रयोग के बाद आप इस बात का अनुभव कर सकते हैं कि आपके भीतर के दबे हुए वेग उड़ गए, आप हल्के होकर कमरे के बाहर आ गए। उस दिन दिनभर आप क्रोध न कर पायेंगे, उतनी आसानी से जितनी आसानी से कल किया था। उतनी आसानी से किसी को घूंसा न बांध पायेंगे, जितनी आसानी से सदा बांधा था। वे ही कारण, जो कल आपकी आंखों को लाल खून से भर देते, आज आपकी आंखों को झील की तरह नीला ही छोड़ जायेंगे। और एक हंसी भी अपने पर आनी शुरू होगी कि जिस हिंसा की ऐसे ही निर्जरा हो सकती थी, उसके लिए अकारण ही मैंने दूसरों को पीड़ा देकर दुष्ट-चक्र निर्मित किये, विसीयस सर्किल बनाए।
महावीर एक गांव के पास खड़े थे और कुछ लोगों ने आकर उन्हें बहुत पीटा। किसी ने उनके कान में खीलें ठोंक दीं। वे खड़े देखते रहे। पीछे किसी ने उनसे पूछा, आपने कुछ भी न कहा? आप कुछ तो बोलते, इतना तो कहते कि अकारण मुझे क्यों मार रहे हो?
तो महावीर ने कहा, अकारण वे नहीं मार रहे थे। उनके भीतर मारने की बात का जरूर ही कोई कारण रहा होगा। हो सकता है, मुझसे संबंधित न हो कारण, लेकिन उनके भीतर तो कारण रहा ही होगा। और फिर मैंने सोचा कि वे मुझे ही मार लें तो बेहतर है, वे किसी दूसरे को मारेंगे, तो बिना मार का उत्तर पाए वापस न लौटेंगे। उनकी हिंसा की निर्जरा हो जाये। तो मुझसे बेहतर आदमी उन्हें खोजना मुश्किल है।
महावीर तकिए की तरह ही व्यवहार किये उन लोगों के साथ।
ध्यान में, दबे हुए समस्त-वेगों की निर्जरा होती है--वे चाहे हिंसा के हों, चाहे क्रोध के हों, चाहे काम के हों, चाहे लोभ के हों--ध्यान में समस्त दबे वेगों की निर्जरा होती है। और जब वेगों की निर्जरा हो जाये, जब सप्रेस्ड, दबी हुई शक्तियां बिखर जायें, तो वृत्ति से छुटकारा पाने में बड़ी आसानी हो जाती है। जब किसी के घर की तिजोरी का सारा धन फिंक जाये, तो तिजोरी को फेंकने में बहुत देर नहीं लगती। तिजोरी को तो आदमी बचाता ही इसलिए है कि उसके भीतर जो धन इकट्ठा है। अगर तिजोरी का सारा धन बांट दिया गया हो, तो तिजोरी को दान करने में बहुत कठिनाई नहीं पड़ती।
हिंसा की वृत्ति से छुटकारा पाना उतना कठिन नहीं पड़ेगा। हिंसा के वेग, जो हिंसा की वृत्ति को तिजोरी बनाकर बैठ गए हैं, उनसे छुटकारा पाना ही पहला सवाल है। और जिस दिन सारे वेग मुक्त हो जाते हैं, उस दिन हिंसा अपनी नग्नता में, अपनी टोटल नेकेडनेस में दिखाई पड़ती है। और जब कोई व्यक्ति हिंसा को उसकी पूरी नग्नता में देखने में समर्थ हो जाता है, तो वह एक क्षण भी हिंसक नहीं रह सकता। क्योंकि हिंसा को उसकी पूरी नग्नता में देखना, उससे मुक्त हो जाना है। वह इतनी पीड़ा है, वह इतनी कुरूपता है, वह इतनी गंदगी है, कि उसमें कोई एक क्षण भी रुकने को राजी नहीं होगा। वह ऐसा ही है हिंसा को उसकी पूरी नग्नता में देखना, जैसे किसी के घर में आग लग गई हो, और लपटों में घर घिर जाए, और फिर कोई आदमी जब लपटों को देख ले, तो एक क्षण भी उस घर में रुकना संभव न हो। वह छलांग लगाये और बाहर निकल जाये। ठीक ऐसे ही हिंसा की लपटों में घिरा आदमी बाहर कूद पड़ता है। लेकिन हिंसा की लपटें दिखाई नहीं पड़तीं, क्योंकि हिंसा की वृत्ति और स्वयं के बीच में न-मालूम कितनी पर्तें हैं दबे हुए वेगों की। उन वेगों के कारण हिंसा की वृत्ति का दर्शन नहीं हो पाता। उसके कारण नेकेड वायलेंस दिखाई नहीं पड़ती। उसके कारण हमेशा ही हमें यही दिखाई पड़ता है कि हिंसा भी हमारी मित्र है, क्योंकि हिंसा का हमें उपयोग करना है। कल कोई दुश्मन होगा, कल कोई हमला करेगा, तो जवाब कैसे देंगे? वे जो बीच में दबे हुए वेग हैं, उनकी लंबी धुएं की पर्तों के कारण हिंसा की नग्नता दिखाई नहीं पड़ती।
ध्यान, वेगों से मुक्ति दिलाकर हिंसा का आमना-सामना, एनकाउंटर करा देता है। और जिस आदमी ने भी हिंसा को देख लिया, वह अहिंसक हो गया। जिस आदमी ने भी हिंसा को पहचान लिया, उसके हिंसक होने के फिर उपाय नहीं रह जाते। क्योंकि कोई भी आदमी जान कर नर्क में उतरने को कभी राजी नहीं होता है। और अगर कभी कोई नर्क में उतरता है, तो वह नर्क को स्वर्ग समझकर ही उतरता है। कोई आदमी कभी आग की लपटों में नहीं उतरता और अगर उतरता है तो आग की लपटों को स्वर्ग का द्वार समझकर ही उतरता है।
ध्यान विसर्जन है, निर्जरा है, कैथार्सिस है। ध्यान का अर्थ है: आपके भीतर जो हो रहा है, उसे अकारण प्रकट हो जाने दें--किसी पर नहीं, शून्य में। उसे शून्य को समर्पित कर दें।
अब जब क्रोध आये, तो एक छोटा-सा प्रयोग करके देख लें। जब क्रोध आये, तो द्वार बंद कर लें और खाली कमरे में क्रोधित हो जायें। पूरा क्रोध कर लें खाली कमरे में। बहुत हंसी आयेगी, क्योंकि बड़ा अजीब मालूम पड़ेगा, एबसर्ड मालूम पड़ेगा। सदा क्रोध दूसरों पर किया है, लेकिन एक बार अकेले में करके देख लें और तब दूसरे पर करना मुश्किल होता जायेगा। पहली दफे अकेले में हंसी आयेगी और दूसरी दफे से दूसरे पर करने में हंसी आने लगेगी। क्योंकि जो पागलपन आप अकेले में भी नहीं कर सकते, वह पागलपन आप सबके सामने कैसे कर सकते हैं? और जो पागलपन अकेले में भी हंसी लाता है, वह चार आदमियों के सामने करके लोगों के मन में आपकी क्या तस्वीर बनाता होगा? इसकी कल्पना कमरे में आईना रखकर और दिल खोलकर क्रोध कर के देख लें। तोड़ना ही हो, तो आईने को तोड़ देना। और उस सारे विध्वंस के बीच खड़े होकर देखना कि आपके भीतर किस तरह के जहर हैं! इनकी निर्जरा होगी। इनकी कैथार्सिस होगी। ये गिर जायेंगे। और इनके गिरने के बाद आप अपनी हिंसा को देखने में समर्थ हो सकेंगे।
हिंसा से मुक्ति के लिए हिंसा का दर्शन अनिवार्य है।
-osho.com से साभार